वेरीनाग और झेलम नदी का उदगम
जय श्री राम!
वेरीनाग अनंतनाग जिले में हैं| वेरीनाग को वीरनाग भी कहा जाता हैं| अगर आप कश्मीर घुमने जाना चाहते हैं तो आपको ज्यादातर श्रीनगर, गुलमर्ग, सोनमर्ग इत्यादि का ही पैकेज बेचा जाता हैं| अनंतनाग जिले में आप काफी कुछ देख सकते हैं जो श्रीनगर, गुलमर्ग और सोनमर्ग से भी ज्यादा सुंदर हैं|
जहाँगीर और मुग़ल गार्डन
"वेरीनाग के तालाब को जहाँगीर ने अपने हिसाब से अष्टकोनी कुए का स्वरुप दे दिया और एक गार्डन बना दिया जिसे मुग़ल गार्डन कहते हैं|| ऐसा वामपंथी इतिहासकार कहते हैं| और कुछ लोगों के हिसाब से झेलम का इस कुए से उद्गम होता हैं|
पर जब जहाँगीर जैसा आततायी इस जगह पंद्रह साल रहा होंगा तो उसने कई हिन्दूओं का संहार किया और हिंदुत्व की सभी निशानिया या तो मिटा दी, उसपर अपने हिसाब से लुटेरी सोच वाला नकाब पहना दिया, और सारी दीवारों पर पारसी में अपनी वाह वाही लिखवा दी| मुगलों को अपना पूर्वज मानने वाले अलगाववादी कश्मीरी लोग आज की तारीख में उर्दू में अधिकारिक काम करते हैं, कश्मीरी में आपस में बात करते हैं पर ये मुगलों की पारसी भाषा में कुछ भी नहीं करते, ऐसा क्यों? इसका उत्तर अगर पता हो तो कमेंट जरुर करना|
मंदिर कही गुल कर दिया और जगह को नकाब पहना कर मुग़ल गार्डन का नाम दे दिया| ये कश्मीर के हर गाव में एक मुग़ल गार्डन तो मिल ही जायेगा| ये मुग़ल इतने गार्डन बना रहे थे और किस तरह बना रहे थे ये आप ही सोच लीजिये| और वामपंथी इतिहासकार जहाँगीर को एक उच्च कोटि का कलाप्रेमी बताने में कोई कमी नहीं करते हैं| पर ये इतिहासकार ये बताना भूल जाते हैं की इस जहाँगीर के पुरे वंश का नाश किस तरह उसीके लोगों ने किया हैं|
खैर तुजुक ए जहाँगीर के अनुसार यहाँ के आठ भुजाओं वाला कुंड था जिसकी हर भुजा २० यार्ड की थी| इस कुंड के आठों दिशाओं में कई एक जैसी गुफाएं थी| और बाद में जहाँगीर के कहने पर हर गुफा के सामने एक आर्क बनायीं गयी और ये गुफाये ढक दी गयी| उसके बाद हर जगह जहाँगीर की तारीफ लिख दी गयी| तो इस सन्दर्भ के हिसाब से तो पहले ही यहाँ पर अष्टकोनी ढाचा था जिसे जहाँगीर ने अपने नाम का नकाब पहना दिया| सत्य को ढक दिया|
हिन्दू साहित्य में उल्लेख
वेरीनाग इस शब्द का उदगम संस्कृत शब्द वितास्तत्र से हुआ हैं| इसका अर्थ हैं इस जगह का उल्लेख हिन्दू धर्मग्रंथो में तथा संस्कृत साहित्य में सदियों पहले ही हुआ हैं| अष्टकोनी कुए वैदिक सभ्यता के अनुसार पूजनीय होते थे और कश्मीर के ज्यादातर मंदिर अष्टकोनी हैं| अष्टकोनी का अर्थ हैं जिसे आठ कोण हैं और आठ भुजाये हैं ऐसा ज्यामितीय आकार| ज्यादा तर मंदिरों के गर्भगृह अष्टकोनी होते हैं और मध्य में देवताओं की मूर्तियाँ होती हैं| और नदी पूजनीय देवी ही होती हैं|
ये शिवलिंग उसी अष्टकोनी कुए के किसी आर्क में स्थित हैं और यही इस बात का प्रमाण हैं की यहाँ किसी ज़माने में काफ़िर मूर्तिपूजक रहा करते थे जो नित्य झेलम माता की पूजा भी किया करते थे| प्रकृति का पूजन क्यों करना होता हैं ? इस पूजन का एक ही लक्ष होता हैं की प्रकृति को धन्यवाद दिया जाए| पर शिवलिंग की हालत देखकर यह भी कहा जा सकता हैं की इसकी पूजा नहीं की गयी हैं कई सालों से| ये तो किसी ने चुपके से एक फुल अर्पित कर रखा हैं| और यह मंदिर सर्वथा अधुरा हैं क्यों की कही भी नंदी नहीं हैं| और यहाँ पर शिव के साथ पराशक्ति दिख नहीं रही हैं| अब आप सोचिये एक अधूरे शिवलिंग को जहाँगीर जैसे ने क्यों छोड़ दिया होगा? और इसे वहा रहने वाले लोग क्या कहते होंगे?
पुराणों के हिसाब से देवी वितस्ता यानि की देवी झेलम का यहाँ से उद्गम होने के लिए अवतरित हुई पर यहाँ शिवजी का निवास था तो वो थोडा पीछे गयी और वहा से फिर झेलम का उद्गम हुआ हैं| और पुराणों के हिसाब से झेलम का अवतरण इस जगह से वायव्य (उत्तर-पश्चिम) दिशा में १ मिल दूर से अवतरित हुई|
कुछ कथाओं के अनुसार यह निलानाग का निवास स्थान हैं और निलनाग सभी नागों के अर्थात कश्मीर के सभी जल स्रोत के देवताओं के प्रमुख माने गए हैं| हिन्दू मान्यताओं के अनुसार सभी जल स्रोतों का रक्षण एक देवता करते हैं और कश्मीर में इन देवताओं को नाग कहा गया हैं|
एक कथा के अनुसार यहाँ सतिसार नामक तालाब हुआ करता था जिसमे माता सटी अर्थात पारवती वास करती थी| भगवान विष्णु ने इस जगह एक हल से प्रहार कर तालाब के पानी को बहा दिया और सबको माता पार्वती के दर्शन हुए| और फिर जिस दिशा में पानी गया वही झेलम नदी कहलाई गयी| संस्कृत में झेलम नदी को वितस्ता कहा गया हैं| इस कथा के अनुसार झेलम पार्वती का ही एक स्वरुप हैं| इसीलिए झेलम की भी वैसी ही पूजा होती थी जैसी हम सप्त नदियों की करते हैं|
रजतरंगीनी के अनुसार इस कुंड को निलकुंड कहा जाता था|
कुछ लोगो के हिसाब से यहाँ भाद्रपद के कृष्ण त्रयोदशी के दिन झेलम के अवतरण का पर्व मनाया जाता हैं| पर कितने लोग इस पर्व को मनाने के लिए आते हैं इसका कोई अकड़ा नहीं हैं और यह खबर हर साल आती हैं की इस मेले का विरोध स्थानिक लोग करते हैं| अब किसी हिन्दू पर्व का विरोध कौन करते हैं ये मुझे बताने की जरुरत नहीं हैं|
नदी पूजन
यह पवित्र नदी झेलम माता का उद्गम स्थल हैं और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार नदी का उद्गम स्थल और नदी दोनों ही पूजनीय हैं| आप अगर गंगोत्री या जमुनोत्री जाओगे तो नदी की पूजा करोगे| पर यहाँ झेलम की पूजा नहीं कर पाओगे? अब आप पूछोगे क्यों, पूजा क्यों नहीं कर पाएंगे? तो इसका उत्तर एक ही हैं की आज कश्मीर में नदी की पूजा कर नदी को धन्यवाद देने वाले कोई नहीं बचे हैं| तो इस वीरनाग के मुग़ल गार्डन में जहा झेलम के उदगम स्थान को अष्टकोनी कुए का स्वरुप दिया गया हैं उस जगह की पूजा नहीं कर पाएंगे| फिर भी आपको झेलम नदी के उद्गम की पूजा करनी हैं तो अपने साथ पूजा की सामग्री आपको लेकर जानी पड़ेगी और अपनी जोखिम पर शांति से छोटी सी पूजा इस कुए की करनी पड़ेगी|
स्थानिक लोग हमेशा से हिन्दूओं के यहाँ आने का विरोध करते आये हैं| पूजन तो बड़ी दूर की बात हैं| अगर आप फिर भी किसी तरह यहाँ आ भी गए तो भी स्थानिक लोग आपका विरोध करते रहेंगे आपको नीलकुंड तक जाने नहीं दिया जायेगा और अगर आप महिला हैं तो आपके साथ अभद्र व्यवहार करने वाले आपको कई मिल जायेंगे| जाना और जाकर पूजा करना या नहीं जाना ये आपका निर्णय हैं|
यहाँ तक पढ़ने के लिए धन्यवाद! महादेव आपकी रक्षा करे!

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