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Showing posts from March, 2024

६) हमारा घर:

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  ६) हमारा घर: १९५० की फिल्म ‘हमारा घर’ का गीत ‘रंग भरी होली आई’ होली पर आधारित हैं। इस गीत के बोल के अनुसार मस्ती मे डूबे लोगों की टोली मस्ती मे झूमती गोकुल के गाव जा रही हैं। मुरली की धुन पर लड़की अर्थात राधा नाच रही हैं। लड़के ने उसपर पिचकारी मारी तो उसकी साड़ी गीली हो गई हैं। बीच सड़क पर नाचती इस लड़की की सब लड़के ठिठोली कर रहे हैं। [1] मो. रफी का ये गीत भीगी लड़की और सब लड़के उसे किस तरह छेड़ते हैं इसका का उल्लेख करता हैं। राधा कृष्ण का संदर्भ लेकर इस आशय का गीत केवल होली पर ही क्यू हैं? [1] https://www.hindilyrics4u.com/song/rang_bhari_holi_aayi.htm   अगर आप मेरे कार्य से सहमत हैं तो कृपया इस पुस्तिका को अन्य भाई-बहनों के साथ साझा करें। यहा तक पढ़ने के लिए धन्यवाद! अनुक्रमणिका होली का विकृत स्वरूप: होली गीतों पर एक चिंतन! - लेखिका: रिंकू ताई  

५) जोगन:

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  ५) जोगन: १९५० में एक फिल्म आई ‘जोगन’। इस फिल्म में ‘डालो रे रंग डालो रे रसिया’ यह गाना होली पर चित्रित किया गया है। पूरे गाने का अर्थ है प्रेमीका प्रेमी के साथ लाज शर्म भूल कर होली के मौके पर एक होने के लिए तैयार है। [1] यह फिल्म केदार शर्मा ने दिग्दर्शित की थी। इस फिल्म में नायिका का नाम मीराबाई (नरगिस दत्त उर्फ फातिमा रशीद) है जो एक विवाहित स्त्री है। नायिका पराए पुरुष विजय (मो. यूसुफ़ खान) जो नास्तिक है उससे प्रेम करती हैं। [2] पूरी फिल्म ही हिन्दू भावनाओं को आहत करती हैं। यह फिल्म विवाहबाह्य प्रेमसंबद्धों को बढ़ावा देती हैं। पर यह अपने जमाने मे सुपरहिट हुई थी क्यू की हम हिन्दू ही मीरा के भजनों से प्रभावित होकर इसे देखने गए थे। राजस्थान की संत परंपरा में मीराबाई एक महान कृष्णभक्त संत होकर गई है। उनके कई भजन इस फिल्म में हैं। मीराबाई कृष्ण की भक्त थी। इस फिल्म में जो मीरा नाम का किरदार है वह पर-पुरुष के प्रेम में अंधी हो चुकी हैं। भक्तिमय होना और प्यार में अंधा होना दोनों में उत्तर और दक्षिण का फर्क है। पर इस फिल्म में दोनों को एक ही रंग में रंगा है। और यह एक ट्रेंड बन चुका हैं...

४) सावरियाँ:

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  ४) सावरियाँ: १९४९ की फिल्म ‘सावरियाँ’ का गीत ‘जरा बच के’ होली पर चित्रित हैं। इस गीत के बोल के अनुसार लड़की ने होली के दिन बच के रहना चाहिए क्यू की कोई पिचकारी मारेगा तो कोई कलाई मरोड़ेगा। सब लोग भांग पीकर होली खेलने चले हैं। [1] महिलाओं को छेड़ना और भांग पीना होली हैं ये आशय देने वाला ये गीत तब का हैं जब देश मे संविधान भी लागू नहीं हुआ था। इसी चलन के गीत आज भी फिल्मों मे होली के अवसर पर बताए जाते हैं। नशे और होली को जोड़ता हुआ यह शायद पहला फिल्मी गाना भारतीय सिनेमा के इतिहास मे बना हैं। [1] https://www.hindilyrics4u.com/song/zara_bach_ke_maro_pichkari_kalai_tumhari_na_lachke.htm   अगर आप मेरे कार्य से सहमत हैं तो कृपया इस पुस्तिका को अन्य भाई-बहनों के साथ साझा करें। यहा तक पढ़ने के लिए धन्यवाद! अनुक्रमणिका होली का विकृत स्वरूप: होली गीतों पर एक चिंतन! - लेखिका: रिंकू ताई  

३) शादी:

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  ३) शादी: १९४१ की फिल्म ‘ शादी ’ मे होली पर चित्रित गीत के बोल हैं ‘भिगोई मोरी साड़ी रे’। गीत की नायिका पहले ही बोल रही हैं की होली के अवसर पर रंग खेलते समय उसकी चोली (स्त्रियों का एक तरह छाती पर पहनने का वस्त्र, सहसा अंतरवस्त्र) न भिगाई जाए। [1] होली के साथ चोली को जोड़कर महिला को वस्तुनिष्ट बनाया गया हैं। शादी यह फिल्म जयंत देसाई ने निर्देशित की हैं। [2] [1] https://www.hindilyrics4u.com/song/bhigoi_mori_saari_re.htm [2] https://www.imdb.com/title/tt0214109/   अगर आप मेरे कार्य से सहमत हैं तो कृपया इस पुस्तिका को अन्य भाई-बहनों के साथ साझा करें। यहा तक पढ़ने के लिए धन्यवाद! अनुक्रमणिका होली का विकृत स्वरूप: होली गीतों पर एक चिंतन! - लेखिका: रिंकू ताई  

२) औरत:

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  २) औरत: १९४० के पहले तक भारतीय सिनेमा में प्राचीन इतिहास पर आधारित फिल्में बनती थी। १९४० आते आते फिल्मों में अन्य विषयों पर भी चित्रण शुरू हो गया था खासकर सामाजिक समस्याओं पर। १९४० के दशक मे महबूब खान ने फिल्म बनाई ‘औरत’। इस फिल्म मे दो होली के गीत हैं। पहला ‘जमुना तट शाम खेले होली’ और दूसरा ‘आज होली खेलेंगे साजन के घर’। ‘जमुना तट शाम खेले होली’ इस गीत को भजन की तरह आज भी गाया जाता हैं। इस गीत के बोल मे अथवा इसके चित्रण मे कोई आपत्ति नहीं  हैं। यह गीत राधा और कृष्ण के होली का वर्णन है। [1] इसी फिल्म का दूसरा गीत हैं ‘आज होली खेलेंगे साजन के घर’। इस गीत का पूरा अर्थ यह निकलता हैं की प्रेमिका अपने प्रेमी के घर जाकर ही होली खेलना चाहती है। प्रेमिका को ही प्रेमी से मिलने की जिद है। प्रेमिका एक १६-१७ साल की कन्या हैं और अपने प्रेमी से मिलने के लिए और उसके साथ होली मनाने के लिए आतुर है। [2] इस गीत में प्रेम विवश प्रेमिका दिखाई गई है। कहीं पर भी इस गीत में त्यौहार वाला या भक्ति वाला कोई भाव ही नहीं है। १९४० के दशक से लेकर आजतक बाली उम्र का प्यार सबसे पवित्र होता हैं और वही सच्चा ...

१) होली:

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  १) होली: १९४० मे एक फिल्म प्रदर्शीत हुई होली। फिल्म की शुरुआत ही होली के सीन से होती हैं। फिल्म की कहानी से ये अभिप्राय निकलता हैं की अगर आपको कोई गरीब लड़की पसंद आजाये तो कुछ मत सोचो, उसके घर के सभी पुरुषों को झूठे केस मे पुलिस के हवाले कर दो और बाद मे उस लड़की को अगवा कर उसके साथ जबरदस्ती विवाह कर लो। [1] अपहरण कर विवाह यह एक सामाजिक समस्या हो गई हैं [2] , कही इसके बीज ऐसी फिल्मों ने तो नहीं बोए? फिल्म मे एक होली का गीत हैं ‘फागन की रुत आई रे’। गाने के बोल सुनकर आपको ऐसे लगेगा जैसे ये गाना कृष्ण को समर्पित हैं। पर आखिर मे ये गीत महिला के यौवन पर आकार खत्म होता हैं। [3] कृष्ण का नाम ले लेने से कोई अश्लील गीत भजन नहीं बनता हा पर भक्ति भावना जरूर आहत हो जाती हैं। [1] https://en.wikipedia.org/wiki/Holi_(1940_film) [2] https://timesofindia.indiatimes.com/city/bengaluru/over-46-minor-girls-kidnapped-for-marriage-each-day-in-2021-ncrb/articleshow/94039605.cms [3] https://www.oyelyrics.com/phaagan-ki-rut-aayi-re-lyrics-holi-amrit-lal-sitara-devi   अगर ...

होली के हिन्दी सिनेमा के गीत

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  होली के हिन्दी सिनेमा के गीत इस पुस्तिका में आगे कई हिन्दी गानोंपर विश्लेषण दिया गया हैं जो होली पर्व पर फिल्माए गए हैं। यह सभी गीत अपने-अपने समय पर सुपरहिट रहे हैं और आज भी हम इन्हे सुनते हैं। होली के जो अन्य सीन है उनका समावेश इस पुस्तिका में नहीं है। क्योंकि फिल्म का सीन तभी देखा जाता है जब फिल्म देखी जाती है पर गाने हमेशा सुने जाते हैं और गानों के बोल कहीं ना कहीं अपना असर छोड़ते हैं। आप हर रोज एक ही भजन सुनिए और आप हर रोज एक ही दुख भरा गाना सुनिए, दोनों का अलग-अलग असर आपके व्यक्तित्व पर होगा। अगर आप भजन सुन रहे हैं तो निश्चित ही आप भक्तिभाव के धनी बनेंगे। अगर आप दुख भरे गाने ही सुन रहे हैं तो कहीं ना कहीं अवसाद आपको घेर ही लेगा। अगर आप हर रोज अश्लील गाने सुन रहे हैं तो कहीं ना कहीं आपके बरताव में वो झलकेगा। [1] पारंपरिक भजनों को छोड़कर हमने सिनेमा के गाने होली मिलन के आयोजन पर बजाना शुरू किया है। इन गानों के अनुसार होली छेड़छाड़ का मौका, बदले का मौका, बलात्कार का मौका बन गया है। ऐसी फिल्मों को, ऐसे गानों को हमने ही प्रसिद्ध किया है क्योंकि हम ही देखने जाते हैं और हम ही...

रंगपंचमी

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  रंगपंचमी पहले दिन जो होलिका दहन किया उसकी राख रंगपंचमी तक आज भी कई जगहों पर शरीर पर उबटन की तरह लगाई जाती है। इसके पीछे का कारण मैंने पहले ही बताया है। जब राख शरीर पर मलते हैं तो फिर रंग कहा से होली से जुड़ गए? इस समय प्रकृति चारों ओर अपने रंग बिखेर रही होती है। वृक्षों पर से पत्ते गिर चुके होते हैं। पलाश , गुलमोहर , कृष्णकमल , इत्यादि जैसे कुछ वृक्ष होते हैं जिन पर फूलों का बहार आता है। फूलों का अपना एक नाजुक स्वभाव होता है, उनकी तासीर ठंडी होती है। फूलों का उपयोग करके कई सौन्दर्य प्रसाधन (अरे sss कॉस्मेटिक) बनाए जाते हैं। उनमें फूलों की मात्रा कितनी रहती है यह तो पता नहीं पर रासायनिक तत्व बहुत रहते हैं यह बात हमें समझना जरूरी है। पुराने जमाने में और आज भी कुछ जगहों पर फूलों की होली खेली जाती है। या इन फूलों को छांवमें सुखाया जाता है और हल्दी के साथ पीसकर इनका गुलाल बनाया जाता है। हल्दी त्वचा के लिए एक वरदान है। अगर उसके साथ औषधीय गुण वाले फूलों का पाउडर है तो कई त्वचा रोगों के लिए वह अत्यंत लाभकारी उपाय है। फूलों को या फूलों के गुलाल को अगर शरीर पर मल दिया जाए तो ऋतुपरिवर्तन की ...

होलिकादहन के पीछे विज्ञान

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  होलिकादहन के पीछे विज्ञान होलिका दहन सनातन संस्कृति का एक विशिष्ट पर्व है। पुराने जमाने में लकड़ियाँ एवं गोबर के कंडे शुद्ध घी के साथ इस दिन जलाए जाते थे। किसी भी पेड़ की फरवरी और मार्च महीने में छटाई करना आवश्यक होती है। कुछ टहनियां ऐसी भी होती है जो पेड़ों पर ही सूख जाती है और वह पेड़ों के लिए भार हो जाती है। ऐसी टहनियां भी पेड़ों से काटना आवश्यक होता है। अगर छटाई ना की जाए तो वह पेड़ सही ढंग से बढ़ नहीं पाएंगे। यह छाटी हुई और सूखी हुई टहनियों को एकत्रित कर होलीकादहन किया जाता था। आज भी देहातों में ऐसी सूखी हुई टहनियों को ढूंढ कर होलीकादहन किया जाता है। गोबर के कंडे और देसी गाय का घी होलीका पर चढ़ाया जाता है और कपूर से अग्नि दी जाती है। अब कुछ महाज्ञानी कहेंगे कि यह सूखी लकड़ियाँ होलिका में एक साथ जलाने से क्या फायदा? उनका उपयोग तो भोजन पकाने के लिए क्यू नहीं करते थे? पहले के जमाने मे और आज भी कई गावों मे जहा होलिकादहन शांति से होता हैं वहाँ पर सार्वजनिक होलिका दहन के लिए हर घर से पाच या ग्यारह लकड़ियाँ , पांच या ग्यारह गोबर के उपले , एक छोटी कटोरी भर के शुद्ध देसी गाय का घी, एक ना...

होलीकादहन

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  होलीकादहन प्राचीन काल की भक्त प्रल्हाद की कथा होलिकादहन से जुड़ी है और यह कथा सभी को पता है। कश्यप ऋषि के पुत्र हिरण्यकश्यप अपनी सत्ता तीनों लोकों में प्रस्थापित करना चाहते थे। आज हम हिरण्यकश्यप को असुर जाति का मानते हैं। परंतु जन्म से वे एक ऋषिपुत्र थे। हिरण्यकश्यप अपने कर्मों के कारण असुर बने। होलीका हिरण्यकश्यप की बहन थी। होलीका जन्म से ऋषिकन्या थी पर अपने कर्मों के कारण असुरी बनी। हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रल्हादजी बहुत बड़े नारायणभक्त थे और प्रल्हादजी की नारायणभक्ति हिरण्यकश्यप को पसंद न थी। इसी कारण प्रल्हादजी को कई यातनाएं दी गई और उनकी हत्या के भी कई प्रयास किए गए। ऐसे ही असंख्य प्रयासों में से एक था जलती चीता पर उनकी भुआ होलीका के साथ बैठना। होलिका को वरदान में एक दुशाला मिली थी जो अग्नि से रक्षा कर सकती थी। होलीका चिता पर वह दुशाला ओढ़ कर प्रल्हादजी को लेकर बैठी थी। पर वह कहते हैं ना ईश्वर के भक्तों को स्वयं ईश्वर बचाने आते हैं। तो बस वायुदेव ने अपना चमत्कार दिखाया और वह दुशाला प्रल्हादजी के शरीर पर जा गिरी। चिता पर बैठी होलीका भस्म हो गई। प्रल्हादजी नारायण का जाप करते ह...

होलिका उत्सव का मूल स्वरूप

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  होलिका उत्सव का मूल स्वरूप आगे बढ़ने से पहले होली का उत्सव का मूल स्वरूप समझ कर लेते हैं। होली भारतीय सौर वर्ष के समाप्त होने के पहले का पर्व है। इस समय प्रकृति विविध रंगों में रंगी रहती है और होली तथा रंग पंचमी इन्ही रंगों को सम्मान देनेवाले पर्व है। वैसे होलीका दहन से लेकर रंगपंचमी तक यह उत्सव दो पर्वों का है। पर आजकल केवल दो दिन होली मनाई जाती है , पहले दिन होलिका दहन होता है और दूसरे दिन रंग से हम उत्सव मनाते हैं। अगर आप मेरे कार्य से सहमत हैं तो कृपया इस पुस्तिका को अन्य भाई-बहनों के साथ साझा करें। यहा तक पढ़ने के लिए धन्यवाद! अनुक्रमणिका होली का विकृत स्वरूप: होली गीतों पर एक चिंतन! - लेखिका: रिंकू ताई  

हिंदी सिनेमा के दुखी सीन

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हिंदी सिनेमा के दुखी सीन हमेशा से ही हिंदी सिनेमा भारतीय त्योहारों को मनहूस बताने की कोशिश करता आया है। दामिनी जैसी एक फिल्म आती है और वह सुपरहिट हो जाती है जबकि फिल्म में होली को बलात्कार का मौका बताया गया ? हमने देखी तभी तो फिल्म हिट हुई ना! अगर कोई जेम्स आफ बॉलीवुड जैसा विचार प्रवर्तक आता है और फिल्मों की यह गंदगी बड़े अभ्यास पूर्ण तरीके से सबके सामने लाता है तो फिर वह क्या गलत करता है ? इतने सालों तक हमारे त्योहार हमारे ही देश की फिल्मों में गलत तरीके से बताए गए और आज भी यह सिलसिला भारतीय संस्कृति को मिटाने के लिए जारी है उसके पीछे कहीं ना कहीं हिन्दू समाज कारण हैं। भारत की जनसंख्या का अधिकतर हिस्सा हिन्दू धर्म को मानता हैं। हमने ही ये ऐसी फिल्मे देखी हैं और हम ही जो आज भी हमारे त्योहारों पर इन फिल्मों के अर्थहीन गीतों को सुनते और सुनाते हैं। रेडियो पर, टीवी पर सब जगह ये गाने इसीलिए चलाए जा रहे हैं क्यू की हम सुन और देख रहे हैं। हम ही हैं जो होली के बॉलीवुड सोंग्स यूट्यूब पर सर्च करते हैं और उन्हें जोर-जोर से हमारे होली पर्व पर बजाते हैं। इन गीतों का अर्थ, इनमें बताए गए डांस ...

कृष्ण भक्ति और रंगपंचमी

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   होली का नारायण के साथ क्या संबंध हैं ये मैंने पहले ही बताया हैं। रंगपंचमी उत्सव कृष्ण को समर्पित है। कृष्णभक्ति का पर्व है। तो प्रश्न यह उठता है कि यह आज इतना विकृत क्यों हो गया ? क्या हम कृष्ण भक्ति करते हैं होलि के समय ? यह प्रश्न जब हम अपने आप से पूछते हैं तो कहीं ना कहीं कोई उत्तर नहीं मिलता। और फिर से हम ये सोचने लगते हैं ‘कहां गई कृष्ण भक्ति ? ’ बिल्कुल इंदिरा गांधी की लगाई हुई इमरजेंसी के पहले तक होली और रंगपंचमी कृष्ण भक्ति में डूबी होती थी। आज बरसाना जैसी कुछ एक जगह छोड़ दे तो इस पर्व पर कृष्ण भक्ति कही नजर ही नहीं आती। ऐसा क्या हो गया की कृष्ण भक्ति होली और रंगपंचमी से विलग हो गई ? बस इसी प्रश्न का उत्तर अब आगे के कुछ पन्नों में आपको मिलेगा। अगर आप मेरे कार्य से सहमत हैं तो कृपया इस पुस्तिका को अन्य भाई-बहनों के साथ साझा करें। ऐसी ही और चिंतन पुस्तिकाये आपके मनोरंजन एवं ज्ञानवर्धन के लिए मैं लिख सकु इसके लिए अपनी शक्ति के अनुसार नीचे दिए क्यू आर कोड को स्कैन कर दान दे। यहा तक पढ़ने के लिए धन्यवाद! अनुक्रमणिका होली का विकृत स्वरूप: होली गीतों पर एक चिंतन! - लेखिका:...

होली पर ज्ञान

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  होली पर ज्ञान कोई बड़े हिन्दू त्योहार पर धर्म विरोधी ताकते हिन्दू जन मानस को नीचा दिखाने के लिए और अपने आप को बड़ा ज्ञानी बताने के लिए सक्रिय हो जाती हैं। आज हम देखते हैं कि जैसे ही होली आई है कई बड़े-बड़े व्यवसायिक संघटन (अरे sss कंपनियां) अपने विज्ञापन इस तरह देती है जैसे मानो होली मनाएंगे तो बहुत बड़ा नुकसान हो जाएगा। पर्यावरण का दुनिया भर का ज्ञान केवल होली के समय पर इन विज्ञापनों में , सामाजिक संचार माध्यम पर कई नीले निशान वाले खातों पर , इस तरह दिया जाता है जैसे मानो साल भर तो बहुत अच्छा पर्यावरण रहता है। आज अभीव्यक्ति की स्वतंत्रता (अरे sss फ्रीडम ऑफ स्पीच एण्ड इक्स्प्रेशन) के नाम पर हर कोई मुंह खोल के जो मन मे आता है वह सामाजिक संचार माध्यम पर लिख रहा है , बोल रहा है। जैसे-जैसे होली नजदीक आ रही है वैसे-वैसे आपको होलीका कैसे मूलनिवासी थी और कैसे सनातन पुरुष प्रधान संस्कृति ने उसकी बलि ली इस पर आधारित कई लेख मिल जाएंगे , कई वीडियो मिल जाएंगे। पर उसमें होलीका कश्यप ऋषि की पुत्री थी यह मूल तथ्य कहीं पर भी नहीं रहेगा। एक बालक को जीवित जलाने के लिए चिता पर बैठने वाली स्त्री कैस...