अयोध्या निर्णय प्रश्नोत्तरी: भाग 49
जय श्री राम!
बोलो पवनपुत्र हनुमान की जय| बोलो बजरंग बलि की जय|
अयोध्या निर्णय के इस प्रश्न उत्तर श्रृखला में आपका स्वागत हैं|
प्रश्न: विवादित बाबरी ढांचे से जुड़े केन्द्रीय
सुन्नी वक्फ बोर्ड ने प्रस्तुत किये हुए शिलालेखों की प्रमाणिकता पर किसने प्रश्न:
उठाया?
अ) श्री श्री रविशंकरजी
ब) अधिवक्ता पी. एन. मिश्रा
क) जगद्गुरु रामभद्राचार्य स्वामी राम भाद्रचार्यजी
ड) अधिवक्ता डॉ. राजीव धवन
उत्तर: ब) अधिवक्ता पी. एन. मिश्रा| रामजन्मभूमि अभियोग में अखिल भारतीय श्री रामजन्मभूमि पुनरुद्धार समिति के अधिवक्ता थे श्री पी. एन. मिश्राजी| विवादित बाबरी ढांचे से जुड़े केन्द्रीय सुन्नी वक्फ बोर्ड ने तिन शिलालेख प्रस्तुत किये थे जिनके अनुसार “उक्त जगह पर लगभग १५२८ के आसपास बाबर के कहने पर मस्जिद को बाँधा गया, और उस मस्जिद का उपयोग मुस्लिम नमाज अदा करने तथा मजहबी समारोह मनाने के लिए करते थे| जबसे मस्जिद बनी हैं तब से उक्त मस्जिद में नमाज अदा की जा रही हैं|” इन बातों का खंडन करते हुए अधिवक्ता पी. एन. मिश्रा ने प्रस्तुत शिलालेखों की प्रमाणिकता पर सवाल उठाया और यह संशय जताया की १५२८ में बाबर के आक्रमण के बाद जब वो युध्द जित गया तब उसने ये मस्जिद बनाई भी या नहीं|
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प्रश्न: फुहरेर ने बाबरी मस्जिद के बनावट के लिए क्या कहा?
अ) बाबरी मस्जिद के पहले जन्मस्थान पर पुराना राम मंदिर था और उसे मजबूत कसौटी शिलाओ से बनाया गया था|
ब) कसौटी शिलाओ के स्तम्भ मजबूत थे और उनपर कई यंत्रो का उपयोग कर नक्काशी की गयी होगी|
क) पुराने राम मंदिर के कसौटी स्तम्भ का उपयोग मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद के निर्माण के लिए किया था|
ड) उपरोक्त सभी|
उत्तर: ड) उपरोक्त सभी| अलोइस अन्तोन फुहरेर एक जर्मन भारतविद था जिसने अंग्रजो के ज़माने में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के लिए काम किया था| फुहरेर के अनुसार बाबरी मस्जिद १५२५ के आस पास निर्मित हैं| पर उसके पहले जन्मस्थान पर राम मंदिर था जो मजबूत काले रंग की कसौटी शिलाओ से बना था| ये शिलाए इतनी मजबूत थी की मुसलमान इन शिलाओ को तोड़ नहीं सके और फिर उन्हीका उपयोग कर बाबरी मस्जिद बना दी गयी| फुहरेर के हिसाब से हर कसौटी स्तम्भ का आधार समचतुर्भुज हैं और ये बिच में गोलाकार और अष्टभुज आकार में काटे गए हैं| पुरे स्तम्भ की रचना करने के लिए तथा उसपर नक्काशी करने के लिए कई यंत्रो का उपयोग किया गया हैं| मतलब यूरोप के जर्मनी से आया एक पुरातत्व विशेषज्ञ भी ये लिख कर गया था की भारत में वास्तुकला अपने अलग ही स्तर पर थी|
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