अयोध्या निर्णय प्रश्नोत्तरी: भाग 67
जय श्री राम!
बोलो पवनपुत्र हनुमान की जय| बोलो बजरंग बलि की जय|
अयोध्या निर्णय के इस प्रश्न उत्तर श्रृखला में आपका स्वागत हैं|
प्रश्न: अगर कोई जन-उपद्रव करता हैं तो ऐसे उपद्रवी पर कारवाही करने के लिए भारतीय विधिशास्त्र में क्या प्रावधान हैं?
अ) अपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा १३३ के अनुसार अभियोग
ब) नागरिक प्रक्रिया संहिता की धारा ९१ के अनुसार अभियोग
क) उपरोक्त अ) और ब) दोनों
ड) कोई प्रावधान नहीं हैं
उत्तर: क) उपरोक्त अ) और ब) दोनों| कुछ लोग ऐसाभी बोलने वाले मिलेंगेकी
जोरशोरसे होते ध्वनिप्रदूषणके लिए हम कुछ नहीं कर सकते क्योंकी कोई इलाजही नहीं
हैं| ये
वही लोग हैं जो ध्वनिप्रदूषण करनेवालोको पता नहीं क्यों बड़ाही भला मानते हैं|
ध्वनिप्रदूषण
जनउपद्रव हैं और CPCकी
धारा91के तहत कारवाही हो सकती हैं| और ध्वनिप्रदुषण के जनउपद्रव के लिए उपद्रवी के
खिलाफ CRPC की धारा १३३ के तहत भी कारवाही की जा
सकती हैं| पर इस के बारे में भी आपको कभी बताया
नहीं जायेगा|ये बात आपको खुद जाननी और समझनी पड़ेगी
की आपको इन्फ्लुएंस करने वाले किसी एक पक्ष को बचाने के लिए आपको अधूरी जानकारी
क्यों देते है|
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प्रश्न: १८८५ में महंत रघुबरदासजी ने मंदिर निर्माण के लिए उप-न्यायाधीश फ़ैजाबाद के समक्ष जो अर्जी दाखिल की उसमे प्रतिवादी कौन थे?
अ) सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फॉर कौंसिल ऑफ़ इंडिया
ब) मोहम्मद असगर मुतावली
क) फैजाबाद-अयोध्या नगर निगम के अध्यक्ष
ड) उपरोक्त में से कोई भी नहीं
उत्तर: अ) सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फॉर कौंसिल ऑफ़ इंडिया| राम चबूतरा जिसका क्षत्रफल ३५७ वर्ग फ़ीट ही था उस चबूतरे पर एक संगेमरमर का छोटा सा मंदिर रामलला के लिए बनाने की अर्जी महंत रघुबरदासजी ने उप-न्यायाधीश फ़ैजाबाद के समक्ष की थी| इस अभियोग में मंदिर बनेगा तो दंगे होंगे ऐसा कह कर मंदिर निर्माण की अनुमति नहीं दी गयी| तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने हमेशा ही हिन्दुओ को दोयम दर्जा दिया था| महंत रघुबरदासजी ने अपने अभियोग में निर्मोही अखाड़े का कोई भी सन्दर्भ नहीं दिया इसीलिए सर्वोच्च न्यायलय के समक्ष जब रामजन्मभूमि अभियोग चल रहा था तब मंदिर प्रबंधन के लिए निर्मोही अखाड़े से जुड़े जो भी दावे किये थे सभी पर प्रश्नचिन्ह उत्पन्न हो गए| आगे निर्मोही अखाड़े ने जो भी साक्ष्य प्रस्तुत किये उनके बयान अपने आप में बड़े ही भ्रामक थे| भलेही निर्मोही अखाड़े की प्रबंधक के रूप में भूमिका सिध्द नहीं होती हो पर निर्मोही अखाड़े के बैरागियों ने रामजन्मभूमि के लिए जो भी योगदान दिया उसे स्वीकार करना ही चाहिए| एक और अखाड़े के महंत रामजन्मभूमि के लिए काम कर रहे थे जिसका नाम हैं निर्वाणी अणि अखाड़ा| महंत अभिरामजी तथा महंत धरमदासजी निर्वाणी अणि अखाड़े दे थे| निर्वाणी अणि अखाड़े के महंत तथा सदस्यों पर ही २३ दिसंबर १९४९ के दिन प्राथमिकी दर्ज की गयी थी|
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