होलीकादहन

 

होलीकादहन

प्राचीन काल की भक्त प्रल्हाद की कथा होलिकादहन से जुड़ी है और यह कथा सभी को पता है। कश्यप ऋषि के पुत्र हिरण्यकश्यप अपनी सत्ता तीनों लोकों में प्रस्थापित करना चाहते थे। आज हम हिरण्यकश्यप को असुर जाति का मानते हैं। परंतु जन्म से वे एक ऋषिपुत्र थे। हिरण्यकश्यप अपने कर्मों के कारण असुर बने। होलीका हिरण्यकश्यप की बहन थी। होलीका जन्म से ऋषिकन्या थी पर अपने कर्मों के कारण असुरी बनी। हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रल्हादजी बहुत बड़े नारायणभक्त थे और प्रल्हादजी की नारायणभक्ति हिरण्यकश्यप को पसंद न थी। इसी कारण प्रल्हादजी को कई यातनाएं दी गई और उनकी हत्या के भी कई प्रयास किए गए।

ऐसे ही असंख्य प्रयासों में से एक था जलती चीता पर उनकी भुआ होलीका के साथ बैठना। होलिका को वरदान में एक दुशाला मिली थी जो अग्नि से रक्षा कर सकती थी। होलीका चिता पर वह दुशाला ओढ़ कर प्रल्हादजी को लेकर बैठी थी। पर वह कहते हैं ना ईश्वर के भक्तों को स्वयं ईश्वर बचाने आते हैं। तो बस वायुदेव ने अपना चमत्कार दिखाया और वह दुशाला प्रल्हादजी के शरीर पर जा गिरी। चिता पर बैठी होलीका भस्म हो गई। प्रल्हादजी नारायण का जाप करते हुए सकुशल उस चिता के नीचे उतर गए। 

 

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