रंगपंचमी
रंगपंचमी
पहले दिन जो होलिका दहन किया उसकी
राख रंगपंचमी तक आज भी कई जगहों पर शरीर पर उबटन की तरह लगाई जाती है। इसके पीछे
का कारण मैंने पहले ही बताया है। जब राख शरीर पर मलते हैं तो फिर रंग कहा से होली
से जुड़ गए?
इस समय प्रकृति चारों ओर अपने रंग
बिखेर रही होती है। वृक्षों पर से पत्ते गिर चुके होते हैं। पलाश, गुलमोहर, कृष्णकमल, इत्यादि जैसे कुछ वृक्ष होते हैं जिन पर
फूलों का बहार आता है। फूलों का अपना एक नाजुक स्वभाव होता है, उनकी तासीर ठंडी
होती है। फूलों का उपयोग करके कई सौन्दर्य प्रसाधन (अरेsss कॉस्मेटिक)
बनाए जाते हैं। उनमें फूलों की मात्रा कितनी रहती है यह तो पता नहीं पर रासायनिक
तत्व बहुत रहते हैं यह बात हमें समझना जरूरी है।
पुराने जमाने में और आज भी कुछ जगहों
पर फूलों की होली खेली जाती है। या इन फूलों को छांवमें सुखाया जाता है और हल्दी
के साथ पीसकर इनका गुलाल बनाया जाता है। हल्दी त्वचा के लिए एक वरदान है। अगर उसके
साथ औषधीय गुण वाले फूलों का पाउडर है तो कई त्वचा रोगों के लिए वह अत्यंत लाभकारी
उपाय है। फूलों को या फूलों के गुलाल को अगर शरीर पर मल दिया जाए तो ऋतुपरिवर्तन
की वजह से होने वाले कई शारीरिक समस्याओं का उपाय हो सकता है।
अगर हमें पारंपरिक तौर पर फूलों के
गुलाल से ही होली माननी है तो हमारे घर के आसपास की खाली जगह पर हमें पलाश, गुलमोहर, गुलाब, कृष्णकमल जैसे पेड़ों को लगाना चाहिए। इनके
फूलों का उपयोग कर हम अच्छे से होली मना सकते हैं। और फूलों से गुलाल बनाने के लिए
कई लोगों को रोजगार भी मिल सकता है। परंपरा को हम जितना शुद्ध करते जाएंगे उतना
फायदा हमें होता रहेगा।
पलाश के पत्तों से पत्रावलि या पत्तल
बनते हैं। यह पत्तल कागज, प्लास्टिक या थर्माकोल के बने थाली और कटोरियों से कई
ज्यादा अच्छे हैं। क्यू की इनका जैविक विघटन (अरेsss बायोलॉजीकल डिसइन्टीग्रेशन) होता हैं तो यह
पर्यावरण के अनुकूल हैं। पर झूठे पर्यावरणवादी कभी आपको पलाश के पत्तलों पर भोजन
करते हुए नहीं दिखेंगे। ये पत्तल बनाने का व्यवसाय भी कई रोजगार निर्मित करता हैं।
फूलों के गुलाल और पत्तल का उत्पादन करने के लिए कई पौधे भी लगाने पड़ेंगे। ऐसे पौधे लगाने से पर्यावरण भी शुद्ध हो जाएगा और इनकी देखभाल के लिए फिर से रोजगार उत्पन्न होंगे। सनातन की परम्पराए अर्थव्यवस्था को मजबूत करती इसीलिए भारत सोने की चिड़िया था।
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यहा तक पढ़ने के लिए धन्यवाद!
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