होलिकादहन के पीछे विज्ञान

 


होलिकादहन के पीछे विज्ञान

होलिका दहन सनातन संस्कृति का एक विशिष्ट पर्व है। पुराने जमाने में लकड़ियाँ एवं गोबर के कंडे शुद्ध घी के साथ इस दिन जलाए जाते थे।

किसी भी पेड़ की फरवरी और मार्च महीने में छटाई करना आवश्यक होती है। कुछ टहनियां ऐसी भी होती है जो पेड़ों पर ही सूख जाती है और वह पेड़ों के लिए भार हो जाती है। ऐसी टहनियां भी पेड़ों से काटना आवश्यक होता है। अगर छटाई ना की जाए तो वह पेड़ सही ढंग से बढ़ नहीं पाएंगे।

यह छाटी हुई और सूखी हुई टहनियों को एकत्रित कर होलीकादहन किया जाता था। आज भी देहातों में ऐसी सूखी हुई टहनियों को ढूंढ कर होलीकादहन किया जाता है। गोबर के कंडे और देसी गाय का घी होलीका पर चढ़ाया जाता है और कपूर से अग्नि दी जाती है।

अब कुछ महाज्ञानी कहेंगे कि यह सूखी लकड़ियाँ होलिका में एक साथ जलाने से क्या फायदा? उनका उपयोग तो भोजन पकाने के लिए क्यू नहीं करते थे?

पहले के जमाने मे और आज भी कई गावों मे जहा होलिकादहन शांति से होता हैं वहाँ पर सार्वजनिक होलिका दहन के लिए हर घर से पाच या ग्यारह लकड़ियाँ, पांच या ग्यारह गोबर के उपले, एक छोटी कटोरी भर के शुद्ध देसी गाय का घी, एक नारियल, गुड या मिश्री, और थोड़ा सा कपूर दान मे लेकर ही होलिकादहन किया जाता हैं। अगर कोई अपने घर पर वैयक्तिक होलिकादहन करना चाहता हैं तो वो भी पाच लकड़ियाँ, पाच गोबर के उपले, थोड़ा घी, एक नारियल, गुड या मिश्री, और कुछ कपूर के साथ होलिका को बनाता हैं और उसका पूजन कर उसे प्रज्वलित करता हैं। इससे ज्यादा कोई सार्वजनिक होली के लिए लेता नहीं और कोई अपनी वैयक्तिक होली मे भी जलाता नहीं।

अगली सुबह तक होली ठंडी हो जाती हैं और उसकी राख शरीर पर मली जाती हैं। अगर होली मे केवल ऊपर लिखी सामग्री का ही उपयोग हुआ हो तो ऐसी राख आप भी अपने शरीर पर मल सकते हैं। इससे त्वचा को ठंडक मिलती हैं। पेपर, रबड़ के टायर, प्लास्टिक यह कचरा अगर आप जलाएंगे तो निश्चित ही पर्यावरण के लिए धोखा होगा और ऐसे कचरे की राख शरीर पर मलनी भी नहीं चाहिए। बची हुई राख आप अपने घर मे या खेत मे लगे पौधों को दे सकते हैं जिससे एक अच्छा उर्वरक (अरेsss फर्टिलायजर) आपके पौधों को मिलेगा जो नत्र की कमी को पूरा करेगा। अगर पेड़ों की भी सुखी और अतिरिक्त टहनियाँ काट कर चूल्हे मे जलायी जाती हैं तो उसकी भी राख खेतों मे डाल सकते हैं।

आज फसल होने के बाद पराली जला दी जाती है। इस परली के धुएं से हर साल प्रदूषण की समस्या सामने आती है। पर क्या पहले के जमाने में खेत में ही सारा कचरा जला दिया जाता था? नहीं पहले के जमाने में या आज भी कई जगहों पर कभी भी फसल के बाद में खेत में जो जैविक कचरा है उसे जलाया नहीं जाता। उसके पर गोमूत्र डालकर उसकी खाद बनाई जाती है या उसका कंपोस्ट बनाया जाता है। पर जिन्हें कंपोस्ट की मेहनत नहीं करनी है वे लोग इसे सीधा-सीधा जला देते हैं। जलने से जमीन का सूक्ष्मजैविक चक्र (अरेsss माइक्रोबियल साइकिल) बिगड़ जाता है और जमीन की पोषक गुणवत्ता खराब हो जाती है।

फरवरी मार्च महीने में ठंडी की फसल का समय खत्म हो जाता है। फिर से एक बार पूरे खेत में जैविक कचरा रहता है। इस कचरे को इकट्ठा कर इसके दो भाग किए जाते हैं। एक भाग का कंपोस्ट बनाया जाता है और दूसरे को गोबर के कंडों के साथ जलाया जाता है। इस जलाए हुए हिस्से की राख खेतों में डाल देने से कई पोषक तत्व जमीन को मिलते हैं जिससे अगली फसल में फायदा होता है। होली की राख भी इसी तरह सार्वजनिक जगहों पर लगे हुए पेड़ों के तनों में डालने से उन्हें खाद मिलती है।

कई बार सूखी हुई टहनियों में नीम जैसे औषधि वृक्षों की टहनियां भी होती है जिनकी राख औषधिय गुणों से युक्त होती है। ये राख वृक्षों के लिए, खेत की फसल के लिए प्रतिजैविक औषधी (अरेsss एंटीबायोटिक) की तरह काम करती है।

आज हम इस कारण को नहीं जानते, क्योंकि पिछले बाराहसो सालों से भारत की इस पवित्र भूमि पर कई लुटेरे आक्रमण होते गए और यह वैज्ञानिक ज्ञान कहीं ना कहीं इन लुटेरों की सत्ता के समय धूमिल होता गया। पर अब वक्त आ गया है कि हम उस खोए हुए ज्ञान को फिर से संजोके रखें। हमारी प्रथाओं को हमें समझने की जरूरत है और उसी हिसाब से प्रथाओं को शुद्ध रूप में मनाने की भी आवश्यकता है।

 

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यहा तक पढ़ने के लिए धन्यवाद!

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