छेरछेरा


छेरछेरा पर्व का इतिहास: छेरछेरा पर्व छत्तीसगढ़ का एक प्राचीन त्योहार है जो पौष मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस पर्व की उत्पत्ति के बारे में एक मान्यता है कि कौशल प्रदेश के राजा कल्याण साय, जब मुगल सम्राट जहांगीर की सल्तनत में युद्ध कला का प्रशिक्षण लेने गए थे, तो उनकी अनुपस्थिति में 8 साल तक महारानी ने राज्य का काम संभाला। जब राजा वापस लौटे, तो महारानी ने सोने-चांदी के सिक्के बंटवाए, जिससे दान देने की परंपरा की शुरुआत हुई। इसी क्रम में छेरछेरा पर्व का नाम पड़ा।


कौन मनाते हैं: छेरछेरा पर्व छत्तीसगढ़ के सभी वर्गों, जातियों और सम्प्रदाय के लोग मनाते हैं। यह एक सामाजिक त्योहार है जिसमें बच्चे, महिलाएं, पुरुष, और वृद्ध सभी भाग लेते हैं।


क्यों मनाया जाता है: यह त्योहार नई फसल के आने की खुशी में मनाया जाता है। इस दिन धान की फसल की कटाई हो चुकी होती है और किसान अपने कोठारों में अन्न भर देते हैं। छेरछेरा का मुख्य उद्देश्य दान और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना है। माना जाता है कि इस दिन दान करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और पुण्य की प्राप्ति होती है। इसे दान लेने-देने का पर्व माना जाता है।



मनाने का तरीका: 

दान मांगना: छेरछेरा के दिन, बच्चे और युवा समूह बनाकर घर-घर जाते हैं और छेरछेरा गीत गाते हुए अन्न का दान मांगते हैं। उनका कहना होता है, "छेरछेरा, माई कोठी के धान ल हेरहेरा"। लोग उन्हें धान, सब्जी, फल या नकद दान करते हैं।


पूजा-अर्चना: इस दिन मां शाकंभरी और माता अन्नपूर्णा की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि पौराणिक कथाओं में इस दिन भगवान शंकर ने माता अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगी थी।

नृत्य और गीत: गांव में डंडा नृत्य और लोक गीतों के साथ इस त्योहार की धूम मचती है। बच्चे और युवा घर-घर जाकर नृत्य करते हैं और दान एकत्र करते हैं।

सामुदायिक उत्सव: एकत्रित किए गए धान और अन्य वस्तुओं का उपयोग सामुदायिक स्तर पर होता है, जैसे सामूहिक भोजन या पिकनिक। इससे सामाजिक समरसता और एकता की भावना बढ़ती है।


यह त्योहार छत्तीसगढ़ की संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो दान की महान परंपरा को प्रोत्साहित करता है।

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