सूरत का ज्वालामुखी: हिंदुस्तान की एकता और अंग्रेजी दमन की खूनी गाथा 🔥 सूरत , 29 नवंबर 1860 । सुबह का सूरज अभी बुरहानपुर भागोल की तंग गलियों को पूरी तरह नहला भी नहीं पाया था कि हवा में बगावत की आहट गूंजने लगी। 🔔 लेकिन विद्रोह की घंटियाँ क्यों बज रही थीं ? बाजार की दुकानों के बाहर लोग इकट्ठा हो रहे थे—कोई ब्राह्मण नहीं , कोई वैश्य नहीं , कोई शूद्र नहीं , सभी केवल हिन्दू भारतीय थे! 🙌 उनके चेहरों पर गुस्सा था , दिलों में आग थी , और जुबान पर एक ही नारा: "ये इनकम टैक्स नहीं चलेगा! हम अपनी दुकानें बंद करेंगे , जब तक अंग्रेज ये अन्यायी कानून वापस नहीं लेते!" 🛑 बुरहानपुर भागोल का बाजार अब एक रणक्षेत्र बन चुका था। तीन हजार से ज्यादा लोग , जिसमें पुरुष , महिलाएं , जवान , बूढ़े , बच्चे , सब एक साथ खड़े थे। 🚶 ♂️🚶 ♀️ उनके हाथों में न हथियार थे , न तलवारें , बस एकता की ताकत थी। एक युवा व्यापारी , गोविंद भाई , ने भीड़ के सामने चिल्लाकर कहा , " हम अंग्रेजों के गुलाम नहीं! ये टैक्स हमारी मेहनत की कमाई लूटने का हथियार है!" 🗣️ उसक ी आवाज़ ने...
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