जंगलों की छाती से उठा


जंगलों की छाती से उठा,
तिलका मांझी, नाम अमर रहा।
संथाल का वीर, अंग्रेजों का भय,
स्वतंत्रता का सपना, हृदय में रहा॥

अकाल की मार, लूट की आग,
गरीबों की पुकार, उन्होंने सुना।
खजाना बांटा, जनता को दिया,
बलिदान का फल, सभी ने पाया॥

गुरिल्ला की शैली, वन-वन में लड़ा,
अंग्रेजों की चाल, उन्होंने बदल दी।
संथाल हूल, जनजाति का गर्व,
तिलका मांझी, उसका नायक था॥

फांसी का फंदा, जिसने उन्हें लिया,
लेकिन उनका नाम, कभी नहीं मरा।
संथाल का बाबा, प्रेरणा का स्रोत,
तिलका मांझी, अमर कहानी॥

उनके नाम पर, समारोह हुआ,
जन्मदिन और शहादत, दोनों मनाया।
संथाल का गीत, उनकी कहानी कहता,
तिलका मांझी, स्वतंत्रता का प्रतीक रहा॥

Comments

Popular posts from this blog

कानिफनाथ महाराज

सूरत का ज्वालामुखी: हिंदुस्तान की एकता और अंग्रेजी दमन की खूनी गाथा

त्र्यंबक, तहसील त्र्यंबकेश्वर, जिला नासिक: