जैन भगवान धर्मनाथ
भगवान धर्मनाथ जैन धर्म के पंचम तीर्थंकर हैं।
उनका जन्म रत्नपुरी नामक नगर में हुआ था।
उनके पिता का नाम भानु और माता का नाम सुव्रता था।
उनका जन्म नाम धर्मनाथ रखा गया।
बचपन से ही वे बहुत सुंदर और बुद्धिमान थे।
उन्होंने शाही जीवन को त्यागकर संन्यास लिया।
धर्मनाथ ने 500 वर्षों तक तपस्या की।
उन्होंने केवलज्ञान प्राप्त किया, जिससे उन्हें सभी ज्ञान हो गया।
उन्होंने अपना पहला उपदेश रत्नपुरी में दिया।
उनके अनुयायियों में बड़ी संख्या में श्रावक और श्राविकाएँ थीं।
धर्मनाथ ने जीवन भर धर्म और अहिंसा का प्रचार किया।
उन्होंने चारों कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) को जीता।
उनके जीवन का उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति और दूसरों को मार्ग दिखाना था।
उन्होंने अनेक चमत्कार किए जो उनकी शक्ति को दर्शाते थे।
उनका शरीर स्वर्ण की तरह चमकता था।
उन्होंने समवशरण (धर्म-सभा) में अपने उपदेश दिए।
उनके समय में जैन धर्म का विस्तार हुआ।
धर्मनाथ ने अपना पूरा जीवन सत्य और अहिंसा के पथ पर चलाया।
उनका निर्वाण समाधि में हुआ, जो पावन स्थल है।
आज भी उनकी पूजा और स्मरण जैन समाज में होता है।
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