अंजनगांव सुरजी की संधि (30 दिसंबर 1803): विस्तृत जानकारी

इतिहास के पन्नो से गायब एक और अध्याय जिसमें कई पहलुओं पर विचार की आवश्यकता है। आइए इसे पढ़ते है।


ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अंजनगांव सुरजी की संधि दूसरे एंग्लो-मराठा युद्ध (1803-1805) के परिणामस्वरूप हुई थी। यह युद्ध ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा साम्राज्य के बीच लड़ा गया था। उस समय मराठा साम्राज्य कई शक्तिशाली सरदारों (जैसे भोसले, होल्कर, और सिंधिया) में विभाजित था, और ब्रिटिश कंपनी भारत में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए इन शक्तियों को कमजोर करना चाहती थी। इस संधि का संबंध विशेष रूप से नागपुर के भोसले राजवंश से है, जिसके शासक रघुजी भोसले द्वितीय थे।
पहले से विभाजित साम्राज्य को विभाजित करना धूर्त अंग्रेजों के लिए मुश्किल नहीं था।
दूसरे एंग्लो-मराठा युद्ध में ब्रिटिश सेनाओं ने मराठा सरदारों पर कई निर्णायक जीत हासिल की थीं। इनमें लॉर्ड आर्थर वेलेजली (बाद में ड्यूक ऑफ वेलिंगटन) और उनके भाई लॉर्ड गेराल्ड वेलेजली की अगुवाई में असई (Assaye) और अरगांव (Argaon) की लड़ाइयाँ शामिल थीं। इन हारों के बाद भोसले शासक को ब्रिटिशों के साथ संधि करने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह संधि अंजनगांव सुरजी में 30 दिसंबर 1803 को हस्ताक्षरित की गई।
अगर सभी मराठे संगठित होकर लड़ते तो कदाचित अंग्रेज कभी मध्य भारत में अपना शासन नहीं जमा पाते।
संधि की मुख्य शर्तें
अंजनगांव सुरजी की संधि ने भोसले और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संबंधों को औपचारिक रूप दिया। इसकी प्रमुख शर्तें निम्नलिखित थीं:
क्षेत्रीय हस्तांतरण: 
भोसले को कटक (वर्तमान ओडिशा का हिस्सा) और बलासोर सहित अपने पूर्वी क्षेत्र ब्रिटिशों को सौंपने पड़े।
वर्धा नदी के पश्चिम का क्षेत्र, जिसमें गोंदिया और भंडारा जैसे इलाके शामिल थे, भी ब्रिटिश नियंत्रण में चले गए।
सैन्य समर्थन: 
भोसले को ब्रिटिश सेना के लिए 6,000 सैनिकों की एक सहायक टुकड़ी बनाए रखने और उसका खर्च उठाने का आदेश दिया गया। यह "सहायक संधि" (Subsidiary Alliance) का हिस्सा था, जिसके तहत मराठा शासकों को अपनी स्वतंत्रता छोड़नी पड़ी।
स्वतंत्रता का अंत: 
भोसले को अपनी विदेश नीति पर ब्रिटिश नियंत्रण स्वीकार करना पड़ा। उन्हें बिना ब्रिटिश अनुमति के अन्य शक्तियों (जैसे फ्रांसीसी या अन्य मराठा सरदारों) से संधि करने की मनाही थी।
रेजिडेंट की नियुक्ति: 
नागपुर में एक ब्रिटिश रेजिडेंट (प्रतिनिधि) की नियुक्ति की गई, जो भोसले के शासन पर नजर रखता था और ब्रिटिश हितों की रक्षा करता था।
इस तरह आपसी रंजिशो का फायदा हमेशा विदेशी ताकतों को ही मिलता गया है। हमे संगठित होकर हर समस्या एक समाधान करने की आवश्यकता है। पर हम हमारे इतिहास से भी नहीं सीखते।
संधि का स्थान: अंजनगांव सुरजी
अंजनगांव सुरजी, जो उस समय नागपुर के भोसले राज्य का एक महत्वपूर्ण नगर था, इस संधि का स्थान था। यह नगर विदर्भ क्षेत्र में स्थित है और आज भी अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान (जैसे सूर्यदेव मंदिर और गोविंद नाथ स्वामी की समाधि) के लिए जाना जाता है। संधि पर हस्ताक्षर यहाँ इसलिए हुए क्योंकि यह भोसले क्षेत्र में एक रणनीतिक स्थान था, और युद्ध के बाद ब्रिटिश सेनाएँ इस क्षेत्र में सक्रिय थीं।
परिणाम
भोसले की कमजोरी: इस संधि ने नागपुर के भोसले शासकों की सैन्य और राजनीतिक शक्ति को बहुत कमजोर कर दिया। वे ब्रिटिश अधीनता में आ गए। उस समय अगर सभी हिंदू राजा अपने क्षेत्र और जातियों को त्याग कर संगठित होकर अंग्रेजों से लड़ते तो आज स्थिति भिन्न होती। घर का विभाजन कोई बाहर का तभी कर सकता है जब बाहर वाले पर घर वालों से ज्यादा भरोसा होता है। जितना जल्दी हो उतना जल्दी इसे समझ लीजिए।
ब्रिटिश विस्तार: ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को मध्य और पूर्वी भारत में अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका मिला। यह संधि उनके "सहायक संधि" नीति का एक सफल उदाहरण थी। बाहर से आया घर भेदी अपना ही फायदा देखता है और वही अंग्रेजों ने भारत के साथ किया था।
मराठा साम्राज्य का पतन: यह संधि मराठा साम्राज्य के विघटन की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण कदम थी। बाद में सिंधिया (1803 में देवास की संधि) और होल्कर (1805 में राजपुरघाट की संधि) के साथ हुई संधियों ने मराठा शक्ति को और कमजोर किया। पतन तो आज भी हो रहा है कारण है हमारा आपसी विभाजन।
ऐतिहासिक महत्व
अंजनगांव सुरजी की संधि ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विस्तार को तेज किया और भारत में उनकी स्थिति को मजबूत किया। और मूल रियासतों को अपनी स्वतंत्रता और अंत में देश को अपनी स्वतंत्रता खोनी पड़ी।
यह संधि मराठा साम्राज्य के अंत की शुरुआत का प्रतीक थी, जो कभी भारत की सबसे शक्तिशाली शक्ति हुआ करता था।
इस घटना ने विदर्भ क्षेत्र के इतिहास को भी प्रभावित किया, क्योंकि यह क्षेत्र धीरे-धीरे ब्रिटिश प्रभाव में आ गया। कारण एकमात्र मराठा सरदार आपस में विभाजित थे। और इसका परिणाम आम भारतीय जनता को डेढ़सो सालों तक भुगतना पड़ा।
निष्कर्ष
30 दिसंबर 1803 को अंजनगांव सुरजी में हुई यह संधि भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी। यह दूसरे एंग्लो-मराठा युद्ध का परिणाम थी और इसने नागपुर के भोसले शासकों को ब्रिटिश अधीनता में ला दिया। अंजनगांव सुरजी, जो पहले एक समृद्ध और रणनीतिक नगर था, इस संधि के कारण इतिहास में अमर हो गया। 

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