हिंदू संस्कार भाग ३
संस्कार: मनवाजीवन के नवनिर्माण की योजना
संस्कार एक ऐसा शब्द है जो भारतीय दर्शन और संस्कृति में गहराई से समाया हुआ है। यह न केवल व्यक्ति के चरित्र, विचार और व्यवहार को परिष्कृत करने की प्रक्रिया को दर्शाता है, बल्कि यह जीवन के नवनिर्माण की आधारशिला भी है। संस्कार का अर्थ है दुर्गुणों को दूर करके सद्गुणों को स्थापित करना, जो शिक्षा, अनुशासन, आत्म-संयम और आत्म-ज्ञान के माध्यम से संभव होता है। उपनिषद, जो भारतीय दर्शन के प्रमुख ग्रंथ हैं, संस्कार की अवधारणा को विभिन्न रूपों में प्रस्तुत करते हैं। ये ग्रंथ व्यक्ति को आंतरिक शुद्धि और आत्मिक विकास की ओर प्रेरित करते हैं, जिससे वह अपने जीवन का नवनिर्माण कर सके। आधुनिक युग में उपनिषद आपको मिल सकते है अगर आप पढ़ना चाहे तो। डाउनलोड करके भी आप पढ़ सकते है और अगर आप चाहे तो खरीदकर भी पढ़ सकते है। कई ऑनलाइन पोर्टल पर है। पढ़िए और जानिए। आपकी हर क्रिया आपके आसपास की हर क्रिया आप पर कोई न कोई संस्कार अवश्य करते रहती है। पर कुछ क्रिया विशेष रूप से की जाती है जिससे मनुष्य पूर्णता की और जाता है, उसे ही संस्कार कर्म कहा जाता है।
संस्कार का अर्थ और महत्व
संस्कार शब्द संस्कृत के "सम्" (पूर्णता) और "कार" (क्रिया) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है "पूर्णता की ओर ले जाने वाली क्रिया"। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति के भीतर छिपे दुर्गुणों जैसे अहंकार, लोभ, क्रोध और अज्ञान को पहचानकर उन्हें दूर करती है और सत्य, धैर्य, करुणा, संयम जैसे सद्गुणों को स्थापित करती है। भारतीय दर्शन में संस्कार को केवल व्यक्तिगत विकास तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इसे समाज के कल्याण और नवनिर्माण से भी जोड़ा गया है। जब व्यक्ति अपने जीवन को संस्कारों के माध्यम से परिष्कृत करता है, तो वह समाज के लिए भी एक प्रेरणा बनता है। उपनिषदों में संस्कार को आत्म-ज्ञान और आत्म-विकास के साधन के रूप में देखा गया है, जो जीवन को नवनिर्माण की ओर ले जाता है। दुष्कर्म करना आसान है, सहज असुरी प्रवृत्तियों को अपनाना भी आसान है, पर मुश्किल है सत्कर्म करना, सद्प्रवृति को अपनाना, इसलिए संस्कार कर्म का विधान पुराने जमाने में रहा करता था। लोग सद्भावनाओं से परिपूर्ण होकर एक दूसरे के साथ प्रेम से रहते थे, तभी तो नवनिर्माण भी होता था।
उपनिषदों में संस्कार की अवधारणा
उपनिषद भारतीय दर्शन के आधारभूत ग्रंथ हैं, जिनमें आत्मा, ब्रह्म और जीवन के उद्देश्य पर गहन चिंतन प्रस्तुत किया गया है। ये ग्रंथ संस्कार को जीवन के नवनिर्माण की योजना के रूप में विभिन्न संदर्भों में प्रस्तुत करते हैं।
1. कठोपनिषद: आत्म-ज्ञान के माध्यम से नवनिर्माण
कठोपनिषद में नचिकेत और यम के संवाद के माध्यम से संस्कार की प्रक्रिया को स्पष्ट किया गया है। नचिकेत एक युवा जिज्ञासु है, जो अपने पिता के यज्ञ में दी गई दान की वस्तुओं की उपयोगिता पर सवाल उठाता है। वह मृत्यु के रहस्य को समझने के लिए यम से आत्म-ज्ञान की मांग करता है। इस कथा में नचिकेत भौतिक लालच, अहंकार और क्षणिक सुखों को त्यागकर सत्य, धैर्य और जिज्ञासा जैसे गुणों को अपनाता है। यम उसे आत्मा की अमरता और जीवन के वास्तविक उद्देश्य का ज्ञान देते हैं, जिससे नचिकेत मोक्ष प्राप्त करता है।
यह कथा संस्कार की गहनता को दर्शाती है। नचिकेत का जीवन एक उदाहरण है कि कैसे संस्कार व्यक्ति को अपने भीतर झाँकने और दुर्गुणों को पहचानने की प्रेरणा देता है। यह प्रक्रिया उसे आत्मिक ऊँचाइयों तक ले जाती है और उसके जीवन का नवनिर्माण करती है। कठोपनिषद सिखाता है कि मनवाजीवन का नवनिर्माण तभी संभव है जब व्यक्ति क्षणिक सुखों से ऊपर उठकर आत्म-ज्ञान की ओर बढ़े।
जब आत्मा की बात उठती है तो कुछ असंतुलित विचारधारा के ज्ञानी कहते है कि आत्मा तो होता ही नहीं है। पर वे ये भूल जाते है की इस मानव शरीर के करोड़ों सेल्स को एक सिंक्रोनाइजेशन में एक ऊर्जा बनाए रखती है, जिसे कुछ जगहों पर चेतना भी कहा जाता है। जैसे ही ये ऊर्जा शरीर को त्याग देती है वैसे ही जीवनलीला समाप्त हो जाती है।
ऊर्जा की व्याख्या के अनुसार ऊर्जा न निर्माण की जाती है न उसका अंत किया जा सकता हैं, वह केवल एक स्वरूप से दूसरे स्वरूप में परिवर्तित की जाती है। भगवद्गीता में कृष्ण कहते है आत्मा न जन्म लेती है, न आत्मा को मारा जा सकता है, वह केवल एक शरीर को त्यागकर दूसरे शरीर को अपनाती है। अब आप ही बताए कि आत्मा और ऊर्जा में क्या अंतर है?
2. मुंडकोपनिषद: ज्ञान और कर्म का संतुलन
मुंडकोपनिषद में संस्कार को आत्म-ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया के रूप में देखा गया है। यह उपनिषद ज्ञान और कर्म के महत्व पर बल देता है। यहाँ कहा गया है कि केवल कर्मकांड और अनुष्ठान व्यक्ति को सांसारिक सुखों तक सीमित रखते हैं, लेकिन आत्म-ज्ञान ही उसे मोक्ष की ओर ले जाता है। मुंडकोपनिषद में एक प्रसिद्ध उद्धरण है:
"सत्यं वद, धर्मं चर" (सत्य बोलो, धर्म का पालन करो)।
यह उपनिषद व्यक्ति को अपने मन को नियंत्रित करने और उसे सत्य की ओर प्रवृत्त करने की शिक्षा देता है। संस्कार इस संदर्भ में दुर्गुणों से मुक्ति और सद्गुणों के विकास की प्रक्रिया है। यह मनवाजीवन के नवनिर्माण के लिए आवश्यक है, क्योंकि यह व्यक्ति को सांसारिक बंधनों से मुक्त करके उसे अपने वास्तविक स्वरूप से जोड़ता है। मुंडकोपनिषद के अनुसार, जब व्यक्ति अपने जीवन को ज्ञान और संयम से परिष्कृत करता है, तो वह न केवल स्वयं का, बल्कि समाज का भी नवनिर्माण करता है।
फूहड़ता के इस दौर के संयम की बात कोई भी नहीं सुनना चाहता। उदाहरण के लिए किसी भी चीज की अति विष बन जाती है। शर्करा सेवन की बात करे तो आज कोई भी इसे त्यागना नहीं चाहता, नई नई मिठाइयां बाजार में उपलब्ध है और हर एक को खाना है। कोई संयम नहीं की कितना खाना और कब खाना। फिर थोड़ी उम्र हो गई कि शुगर डिटेक्ट होती है और फिर शक्कर को बंद करने की सलाह डॉक्टर देते है, उसके बाद सबकुछ बंद, जीवनभर के लिए। अरे भाई संयम रखिए एकसाथ कितना मीठा खाना है इसपर, और फिर शुगर जैसी बीमारी से दूर रहिए। आपके जीवन की ऊर्जा आपके लिए है न कि बीमार शरीर को ठीक करने के लिए, इसीलिए शरीर को बीमार ही न होने दे। (नोट: ये बात मुझे जब समझी तबतक मेरी आधी उम्र बीत चुकी थी। पर जागो तब सबेरा।)
3. छांदोग्य उपनिषद: शिक्षा के माध्यम से संस्कार
छांदोग्य उपनिषद में शिक्षा और गुरु-शिष्य परंपरा को संस्कार का आधार माना गया है। यहाँ श्वेतकेतु की कथा प्रसिद्ध है। श्वेतकेतु अपने पिता उद्दालक से शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाता है। वह शुरू में अहंकार से भरा हुआ है और सोचता है कि उसे सब कुछ पता है। लेकिन उद्दालक उसे आत्म-ज्ञान की शिक्षा देते हैं और कहते हैं:
"तत्त्वमसि" (वह तुम ही हो)।
इस शिक्षा के माध्यम से श्वेतकेतु अपने अहंकार और अज्ञान को त्यागता है और सत्य को समझता है। यह कथा दर्शाती है कि संस्कार शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति के चरित्र को परिष्कृत करता है। छांदोग्य उपनिषद के अनुसार, मनवाजीवन का नवनिर्माण तभी संभव है जब व्यक्ति गुरु के मार्गदर्शन में अपने दुर्गुणों को त्यागे और सद्गुणों को अपनाए। शिक्षा के बिना संस्कार अधूरा है, और यह प्रक्रिया व्यक्ति को एक नए जीवन की ओर ले जाती है।
आधुनिक शिक्षा पद्धति में गुरु अब वैसे नहीं थे जैसे पुरातन काल में रहते थे। जमाना इतनी तेजी से बदल रहा है कि वैल्यू एजुकेशन की एक अलग क्लास हर स्कूल में होती है पर बालक इस क्लास को कभी गंभीरता से नहीं लेते क्यों कि इस विषय का कोई अस्तित्व मार्कशीट में है नहीं। तो बच्चे क्यों इसे गंभीरता से लेंगे?
4. बृहदारण्यक उपनिषद: आत्म-संयम और नवनिर्माण
बृहदारण्यक उपनिषद में आत्म-ज्ञान और ब्रह्म-ज्ञान पर विस्तार से चर्चा की गई है। यहाँ संस्कार को आत्म-संयम और आत्म-नियंत्रण के माध्यम से व्यक्ति के चरित्र को परिष्कृत करने की प्रक्रिया के रूप में देखा गया है। इस उपनिषद में कहा गया है कि व्यक्ति को अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना चाहिए और मन को शांत रखना चाहिए। यह प्रक्रिया दुर्गुणों से मुक्ति और सद्गुणों के विकास में सहायक होती है।
बृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी का संवाद प्रसिद्ध है। याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी को आत्मा की अमरता का ज्ञान देते हैं और कहते हैं कि सच्चा सुख भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्म-ज्ञान में है। यह संवाद दर्शाता है कि संस्कार व्यक्ति को सांसारिक मोह से मुक्त करके उसके जीवन का नवनिर्माण करता है। जब व्यक्ति आत्म-संयम के माध्यम से अपने विचारों और व्यवहार को शुद्ध करता है, तो वह एक नए जीवन की शुरुआत करता है।
संवाद से ही सुसंस्कार हो सकते है। पर आज दो व्यक्तियों के बीच संवाद नहीं होते। एक दूसरे की खिल्ली उड़ाने में, गलतियां निकालने में और अपमानित करने में ही लोग धन्यता मानते है। एक उपनिषद में पति पत्नी का संवाद है जो पढ़कर, समझकर जीवन का कल्याण होता है, पर क्या आजके पति पत्नी संवाद करते है?
5. ईशोपनिषद: कर्म और ज्ञान का समन्वय
ईशोपनिषद में कर्म और ज्ञान के संतुलन पर बल दिया गया है। यहाँ कहा गया है कि व्यक्ति को कर्म करते हुए भी ज्ञान की प्राप्ति करनी चाहिए। एक प्रसिद्ध श्लोक है:
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः" (यहाँ कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की इच्छा करो)।
संस्कार इस संदर्भ में व्यक्ति को कर्म और ज्ञान के माध्यम से अपने चरित्र को परिष्कृत करने की प्रक्रिया है। ईशोपनिषद सिखाता है कि व्यक्ति को अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित करना चाहिए और लोभ, क्रोध, और अहंकार जैसे दुर्गुणों को त्यागना चाहिए। यह प्रक्रिया जीवन के नवनिर्माण के लिए आवश्यक है, क्योंकि यह व्यक्ति को एक संतुलित और सार्थक जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
व्यक्ति अहंकार का त्याग करना ही नहीं चाहता, इसीलिए हर असुरी प्रवृति को अपनाने में लगा रहता है। इसका त्याग करना सीखिए जीवन धीरे धीरे सुखमय हो जाएगा। पर उसके पहले ये भी जानने की कोशिश कीजिए कि ये भावना है क्या?
संस्कार और मनवाजीवन का नवनिर्माण
उपनिषदों में संस्कार को एक ऐसी योजना के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो जीवन को नवनिर्माण की ओर ले जाती है। यह प्रक्रिया निम्नलिखित तरीकों से कार्य करती है:
दुर्गुणों से मुक्ति: संस्कार व्यक्ति को अपने भीतर छिपे दुर्गुणों को पहचानने और उन्हें दूर करने की प्रेरणा देता है। उदाहरण के लिए, नचिकेत ने अहंकार और लालच को त्यागा, जबकि श्वेतकेतु ने अज्ञान को छोड़ा।
सद्गुणों का विकास: यह प्रक्रिया सत्य, धैर्य, संयम और करुणा जैसे गुणों को स्थापित करती है, जो व्यक्ति के जीवन को सार्थक बनाते हैं।
आत्म-ज्ञान की प्राप्ति: उपनिषदों के अनुसार, आत्म-ज्ञान ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है। संस्कार इस लक्ष्य को प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करता है।
समाज के लिए प्रेरणा: जब व्यक्ति अपने जीवन का नवनिर्माण करता है, तो वह समाज के लिए भी एक उदाहरण बनता है। यह समाज के कल्याण और प्रगति में योगदान देता है।
निष्कर्ष
संस्कार जीवन के नवनिर्माण की एक ऐसी योजना है जो व्यक्ति को अपने भीतर की शुद्धि और विकास की ओर ले जाती है। उपनिषदों में इसे विभिन्न रूपों में प्रस्तुत किया गया है- कठोपनिषद में आत्म-ज्ञान, मुंडकोपनिषद में सत्य और संयम, छांदोग्य उपनिषद में शिक्षा, बृहदारण्यक उपनिषद में आत्म-संयम, और ईशोपनिषद में कर्म और ज्ञान के संतुलन के रूप में। यह प्रक्रिया शिक्षा, अनुशासन और आत्म-चिंतन के माध्यम से संभव होती है। संस्कार केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी नवनिर्माण का आधार है। जब व्यक्ति अपने जीवन को संस्कारों से परिष्कृत करता है, तो वह न केवल स्वयं का, बल्कि समाज का भी कल्याण करता है। इस प्रकार, संस्कार भारतीय संस्कृति का एक मूलभूत तत्व है जो जीवन को एक नई दिशा और अर्थ प्रदान करता है।
अपने आप को आधुनिक बताने के चक्कर में संस्कार विहीन पीढ़ी का निर्माण न करिए।
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