स्वातंत्र्यवीर सावरकर का इंग्लैंड प्रवास: क्रांतिकारी कार्यों का स्वर्णिम अध्याय
स्वातंत्र्यवीर सावरकर का इंग्लैंड प्रवास: क्रांतिकारी कार्यों का स्वर्णिम अध्याय
विनायक दामोदर सावरकर, जिन्हें स्वातंत्र्यवीर सावरकर के नाम से जाना जाता है, भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक महान नायक थे। उनकी बुद्धिमत्ता, साहस और राष्ट्रभक्ति ने उन्हें एक प्रखर क्रांतिकारी, लेखक और विचारक के रूप में स्थापित किया। सावरकर का इंग्लैंड प्रवास (1906-1910) उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण चरण था, जिसमें उन्होंने न केवल अपनी शिक्षा पूरी की, बल्कि भारत की स्वतंत्रता के लिए कई ऐतिहासिक कार्य किए। यह लेख उनके इंग्लैंड प्रवास के दौरान किए गए कार्यों पर प्रकाश डालता है।
इंग्लैंड प्रवास की पृष्ठभूमि
सावरकर जून 1906 में कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए। उन्हें श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा छात्रवृत्ति प्रदान की गई थी, जिन्होंने भारतीय छात्रों को स्वतंत्रता के विचारों से प्रेरित करने के लिए लंदन में 'इंडिया हाउस' की स्थापना की थी। सावरकर ने लंदन के ग्रेज़ इन लॉ कॉलेज में दाखिला लिया और वहां इंडिया हाउस में रहने लगे। यह स्थान भारतीय क्रांतिकारियों का केंद्र बन गया, जहां सावरकर ने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को गति दी।
खेद की बात है कि इंडिया हाउस का इतिहास आज पाठशालाओं में बताया ही नहीं जाता।
क्रांतिकारी संगठनों का गठन और प्रचार
सावरकर ने इंग्लैंड में 'फ्री इंडिया सोसाइटी' की स्थापना की, जिसका उद्देश्य भारतीय छात्रों को स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रेरित करना और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संगठित करना था। यह संगठन सशस्त्र क्रांति के विचारों को बढ़ावा देता था। सावरकर ने रविवार को गुप्त सभाओं का आयोजन शुरू किया, जिसमें हरनाम सिंह, मदनलाल धिंग्रा, सेनापति बापट, लाला हरदयाल जैसे क्रांतिकारी शामिल हुए। इन सभाओं में स्वतंत्रता के चार सूत्रीय संकल्प दोहराए जाते थे, जिनमें हिंदी को राष्ट्रभाषा और देवनागरी को राष्ट्रलिपि बनाने का संकल्प भी शामिल था। युवा पीढ़ी को इन स्वतंत्रता सेनानीयों के नाम भी मुश्किल से पता है ये बड़ी दुख की बात है।
सावरकर ने 'अभिनव भारत' संगठन की गतिविधियों को भी इंग्लैंड से संचालित किया। यह संगठन, जिसकी स्थापना उन्होंने 1904 में भारत में की थी, सशस्त्र क्रांति के माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध था। लंदन में उन्होंने इस संगठन की शाखा को और मजबूत किया, जिसके तहत हथियारों की तस्करी और क्रांतिकारी गतिविधियों की योजना बनाई गई। "अभिनव भारत" के नाम से आजकी स्थिति में कोई भी सरकारी योजना नहीं है। उस समय इस शब्द का उपयोग सावरकर जी ने देश की स्वतंत्रता के लिए किया पर क्या आज इस शब्द के उपयोग के साथ युवापीढ़ी के लिए शिक्षा एवं रोजगार के हिसाब से कोई योजना क्यों नहीं बनाई जाती?
लेखन और प्रचार कार्य
सावरकर ने इंग्लैंड में रहते हुए लेखन के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। उनकी सबसे महत्वपूर्ण रचना थी "The Indian War of Independence, 1857", जिसमें उन्होंने 1857 के विद्रोह को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम करार दिया। इस पुस्तक ने ब्रिटिश शासन को हिला दिया, क्योंकि इसमें 1857 की घटनाओं को एक सुनियोजित स्वतंत्रता संग्राम के रूप में प्रस्तुत किया गया था, न कि सिपाही विद्रोह के रूप में। ब्रिटिश सरकार ने इस पुस्तक को प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया, लेकिन सावरकर ने इसे गुप्त रूप से हॉलैंड में प्रकाशित करवाया। यह पुस्तक भारतीय युवाओं में स्वतंत्रता की भावना जागृत करने में अत्यंत प्रभावी रही।
इसके अलावा, सावरकर ने इतालवी क्रांतिकारी ग्यूसेप मैज़िनी की जीवनी का मराठी में अनुवाद किया, जो क्रांतिकारी युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनी। उनके लेख 'इंडियन सोशियोलॉजिस्ट' और 'तलवार' जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए, जो बाद में कोलकाता के 'युगांतर' पत्र में छपे। इन लेखों में उन्होंने ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना की और स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष का आह्वान किया।
युवा पीढ़ी जबतक इन किताबों को पढ़ेंगी नहीं तबतक इस समाज का उत्थान होना मुश्किल है। इन किताबों को देश की सभी ग्रंथालयों में रखना चाहिए। हर गांव में एक ग्रन्थालय कम से कम रहना चाहिए। पढ़ेगा भारत तभी समझेगा भारत और तभी आगे बढ़ेगा भारत।
क्रांतिकारी गतिविधियों को प्रोत्साहन
सावरकर ने इंडिया हाउस को क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बनाया। उन्होंने भारतीय छात्रों को गुरिल्ला युद्ध और हथियारों के उपयोग की ट्रेनिंग दी। उनके नेतृत्व में, मदनलाल धिंग्रा जैसे क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की। सावरकर ने भारत में हथियार भेजने की योजना बनाई, जिसके तहत नासिक में कलेक्टर जैक्सन की हत्या के लिए पिस्तौलें भेजी गईं। इस घटना ने ब्रिटिश सरकार को सावरकर के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के लिए मजबूर किया।
कानून और इतिहास के छात्रों को इस विषय में जानकारी देनेवाला एक विषय जरूरी है, जो भारत के स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया पर आधारित हो।
1857 की स्वर्ण जयंती का आयोजन
10 मई 1907 को सावरकर ने इंडिया हाउस में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की स्वर्ण जयंती मनाई। इस अवसर पर उनके ओजस्वी भाषण ने भारतीय छात्रों में जोश भरा और 1857 के विद्रोह को एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया। इस आयोजन ने ब्रिटिश सरकार की नींद उड़ा दी, क्योंकि यह पहली बार था जब 1857 की घटना को खुले तौर पर स्वतंत्रता संग्राम के रूप में प्रचारित किया गया।
गांधी के साथ मुलाकात और वैचारिक मतभेद
1909 में सावरकर की मुलाकात लंदन में मोहनदास करमचंद गांधी से हुई, जो दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने आए थे। इस मुलाकात में सावरकर और गांधी के बीच वैचारिक मतभेद उभरे। गांधी ने सावरकर की सशस्त्र क्रांति की रणनीति को अत्यधिक आक्रामक बताया, जबकि सावरकर का मानना था कि स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष आवश्यक है। यह मुलाकात सावरकर के दृढ़ संकल्प को और मजबूत करने वाली साबित हुई।
ब्रिटिश सरकार की नजर में खतरा
सावरकर की गतिविधियों ने ब्रिटिश सरकार को सतर्क कर दिया था। इंडिया हाउस और फ्री इंडिया सोसाइटी की गतिविधियों पर ब्रिटिश पुलिस की कड़ी नजर थी। 1909 में सावरकर ने ग्रेज़ इन लॉ कॉलेज से बैरिस्टर की परीक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन उन्होंने ब्रिटिश राजा के प्रति निष्ठा की शपथ लेने से इनकार कर दिया। परिणामस्वरूप, उन्हें वकालत करने की अनुमति नहीं दी गई, और उनकी डिग्री छीन ली गई।
1910 में, नासिक षड्यंत्र कांड (कलेक्टर जैक्सन की हत्या) और मॉर्ले-मिंटो सुधारों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह की साजिश रचने के आरोप में सावरकर को लंदन में गिरफ्तार किया गया। उन्हें भारत भेजा गया, जहां उन्हें दोहरे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
निष्कर्ष
स्वातंत्र्यवीर सावरकर का इंग्लैंड प्रवास उनके क्रांतिकारी जीवन का एक स्वर्णिम अध्याय था। इस दौरान उन्होंने फ्री इंडिया सोसाइटी और अभिनव भारत जैसे संगठनों के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम को संगठित किया, प्रेरक लेखन और पुस्तकों के जरिए भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना जगाई, और सशस्त्र क्रांति की नींव रखी। उनकी पुस्तक "The Indian War of Independence, 1857" और 1857 की स्वर्ण जयंती जैसे कार्यों ने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा प्रदान की। सावरकर का यह योगदान आज भी भारतीय इतिहास में अमर है।
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